Room Me le Jaa ke Maa ko Choda Uncle ne

गर्मियों की एक दोपहर थी। सूरज की किरणें घर की खिड़कियों से झांक रही थीं, और हवा में उमस घुली हुई थी। हमारा छोटा सा घर शहर के बाहरी इलाके में था, जहां शांति थी लेकिन कभी-कभी रिश्तेदारों का आना-जाना इसे जीवंत बना देता था। मैं, राहुल, अपनी माँ के साथ रहता था। पापा की मौत के बाद से माँ ने घर संभाला था। माँ का नाम सीमा था, उम्र करीब 42 साल, लेकिन उनकी फिगर ऐसी थी कि कोई भी 30 साल की औरत को मात दे दे। लंबे काले बाल, गोरा रंग, भरी हुई छातियां जो साड़ी में से उभर आतीं, और कूल्हों की मस्त चाल। लेकिन माँ की आंखों में हमेशा एक बेचैनी रहती थी, खासकर जब कोई पुरुष घर आता।

मेरे अंकल, मम्मी के साले साहब, यानी मम्मी के छोटे भाई, रवि अंकल, आज आने वाले थे। वे शहर से बाहर गांव में रहते थे और हर छह महीने में एक बार आते। अंकल की उम्र 38 साल थी, मजबूत कद-काठी, चौड़ी छाती और दाढ़ी जो उन्हें और आकर्षक बनाती। माँ उनके आने का इंतजार करतीं, लेकिन कभी कुछ कहतीं नहीं। मैंने नोटिस किया था कि उनके आने पर माँ का व्यवहार बदल जाता। वे ज्यादा सजती-संवरतीं, साड़ी में थोड़ा सा ब्लाउज ढीला रखतीं, और आंखों में एक चमक आ जाती।

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दोपहर के दो बजे थे जब अंकल की जीप घर के बाहर रुकी। मैं बाहर गया और उन्हें गले लगाया। ‘कैसा है भतीजा? लंबा हो गया तू!’ अंकल ने हंसते हुए कहा। माँ रसोई से निकलीं, साड़ी में लिपटी हुई, चेहरे पर हल्का मेकअप। ‘भाई साहब, आ गए? इतने दिनों बाद!’ उनकी आवाज में एक मिठास थी जो सामान्य से ज्यादा लग रही थी। अंकल ने माँ को देखा, उनकी नजरें माँ की कमर पर ठहर गईं। ‘सीमा, तू तो और सुंदर हो गई। गांव में तो सब तारीफ करते हैं तेरी।’ माँ शरमाईं, लेकिन उनकी आंखें चमक रही थीं।

हमने चाय पी, बातें कीं। लेकिन माँ बेचैन लग रही थीं। वे बार-बार अंकल की तरफ देखतीं, उनके पैर आपस में रगड़ रही थे। अचानक माँ ने कहा, ‘राहुल, तू बाहर खेलने जा। अंकल थक गए होंगे, मैं उन्हें कमरे में आराम करने को कहती हूं।’ मैं समझ गया कि कुछ तो है, लेकिन कुछ कहा नहीं। बाहर चला गया।

माँ ने अंकल को बुलाया, ‘भाई साहब, आइए अंदर। नहा लीजिए, तरोताजा हो जाइए।’ अंकल मुस्कुराए और माँ के पीछे-पीछे कमरे में चले गए। कमरा हमारा मुख्य बेडरूम था, जहां माँ सोती थीं। दरवाजा बंद होते ही माँ की सांसें तेज हो गईं। अंकल ने बैग नीचे रखा और माँ की तरफ मुड़े। ‘सीमा, तू आजकल कितनी हॉट लग रही है। सालों से तुझे देखा नहीं ऐसा।’ माँ ने साड़ी का पल्लू ठीक किया, लेकिन उनकी छातियां ऊपर-नीचे हो रही थीं। ‘भाई साहब, आप भी तो… इतने मजबूत। गांव की हवा ने आपको और तंदुरुस्त बना दिया।’

अचानक माँ ने अंकल का हाथ पकड़ा और उन्हें बेड पर बिठा दिया। उनकी आंखें लाल हो चुकी थीं, जैसे कोई तलब मिटाने को बेताब हो। ‘भाई साहब, मुझे आपकी याद आती है। रातों को नींद नहीं आती।’ अंकल ने माँ की कमर में हाथ डाला, ‘मुझे भी, सीमा। तू मेरी जान है।’ माँ झुक गईं और अंकल के होंठों पर अपने होंठ रख दिए। किस गहरा था, जीभें आपस में लिपट रही थीं। माँ की साड़ी सरक गई, ब्लाउज के हुक खुलने लगे। अंकल ने माँ की छातियां दबाईं, निप्पल्स सख्त हो चुके थे। ‘आह… भाई साहब, धीरे।’

माँ नीचे झुकीं और अंकल की पैंट की चेन खींची। अंकल का लंड बाहर आ गया, मोटा, लंबा, नसों से भरा। माँ की आंखें चमक उठीं। ‘कितना बड़ा है… साल भर बाद देखा।’ उन्होंने लंड को हाथ में पकड़ा, ऊपर-नीचे करने लगीं। अंकल सिर पीछे करके सिसकारे ले रहे थे। माँ ने जीभ निकाली और लंड की नोक पर चाटा। स्वाद लेने लगीं, जैसे कोई लजीज चीज हो। फिर मुंह में पूरा ले लिया, चूसने लगीं। ब्लोजॉब इतना जोरदार था कि अंकल के लंड से लार टपक रही थी। माँ का सिर ऊपर-नीचे हो रहा था, गले तक लंड ले रही थीं। ‘उफ्फ… सीमा, तू तो एक्सपर्ट हो गई। चूस ले पूरा।’

माँ ने और तेज चूसा, हाथ से अंडकोषों को सहलाया। अंकल का लंड फड़क रहा था, लेकिन वे रुके। ‘बस, अब चुदाई करूंगा तेरी।’ माँ उठीं, साड़ी उतार दी। पेटीकोट खोल दिया, नंगी हो गईं। उनकी चूत गीली थी, बालों से भरी, रस टपक रहा। अंकल ने माँ को बेड पर लिटाया, पैर फैलाए। लंड चूत पर रगड़ा, फिर एक झटके में अंदर डाल दिया। ‘आह्ह्ह… भाई साहब, फाड़ दिया!’ माँ चीखीं, लेकिन आनंद से। अंकल ने पेलना शुरू किया, जोर-जोर से ठोक रहे थे। चूत में लंड घुसता-निकलता, आवाजें आ रही थीं – चपचप, प्लचप।

माँ की छातियां उछल रही थीं, वे अंकल के कंधों पर नाखून गाड़ रही थीं। ‘चोदो मुझे, भाई साहब। साल भर की तलब मिटाओ। तेज… और तेज!’ अंकल ने स्पीड बढ़ाई, माँ की चूत लाल हो गई। वे पोजीशन बदलते गए – डॉगी स्टाइल में माँ को घोड़ा बनाया, पीछे से लंड मारा। गांड पर थप्पड़ मारे। माँ की चीखें कमरे में गूंज रही थीं। ‘हां… मारो गांड पर। मैं तुम्हारी रंडी हूं।’ अंकल ने बाल खींचे, चूत में गहराई तक घुसाया।

फिर माँ ऊपर आ गईं, काउगर्ल पोजीशन में। वे खुद लंड पर उछल रही थीं, चूत ऊपर-नीचे। अंकल नीचे से ठोकर मार रहे। पसीना दोनों पर बह रहा था, कमरा गर्म हो गया। माँ का चरम आने वाला था, ‘आह… बस, झड़ रही हूं!’ चूत सिकुड़ गई, रस बह निकला। अंकल भी सहन न सके, लंड बाहर निकाला और माँ की छातियों पर झड़ दिया। गर्म वीर्य छूटा, माँ ने उंगली से मला और चाट लिया।

दोनों हांफते हुए लेटे। माँ ने अंकल को चूमा, ‘भाई साहब, कभी मत जाना। रोज चोदना है।’ अंकल हंसे, ‘चिंता मत कर, सीमा। मैं तेरी तलब हमेशा मिटाऊंगा।’

लेकिन यह तो शुरुआत थी। शाम तक वे तीन बार और चुदे। पहली बार बाथरूम में, जहां माँ ने अंकल का लंड साबुन से रगड़ा और चूत में ले लिया। पानी के नीचे चुदाई, फिसलन भरी। दूसरी बार रसोई में, जहां माँ झुककर सब्जी काट रही थीं और अंकल ने पीछे से चोद दिया। तीसरी बार रात को, जब मैं सो गया। माँ अंकल के कमरे में गईं, पूरी रात लंड की भूख मिटाई।

अगले दिन सुबह, अंकल जाने वाले थे। माँ फिर बेचैन। आखिरी बार कमरे में बुलाया, ब्लोजॉब दिया, फिर चुदाई। ‘भाई साहब, अगली बार जल्दी आना। मेरी चूत आपका इंतजार करेगी।’ अंकल ने वादा किया।

मैं सब जानता था, लेकिन चुप रहा। माँ की तलब देखकर खुद में भी एक उत्तेजना आ गई। शायद अगली बार मैं भी शामिल हो जाऊं। लेकिन फिलहाल, माँ खुश थीं।

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