Kitchen me Maa ko Uncle ne Dabocha
रात के गहराते अंधेरे में घर शांत था। गांव का पुराना घर, जहां दीवारें पुरानी यादों से भरी हुईं लगती थीं। रवि का परिवार यहां रहता था – पिता एक किसान, जो दिन भर खेतों में मेहनत करते, मां सुनीता, जो घर संभालतीं और रसोई की रानी थीं, और रवि, जो शहर पढ़ने गया हुआ था। लेकिन इस शांत घर में एक रहस्य छिपा था, जो रात के सन्नाटे में ही जागता था। सुनीता की उम्र चालीस के आसपास थी, लेकिन उनका शरीर अभी भी जवां था – भरी हुई छाती, पतली कमर और गोल कूल्हे जो साड़ी में लहराते। उनका चेहरा सुंदर था, आंखों में एक छिपी हुई आग।
अंकल रामेश, सुनीता के ससुराल के भाई, अक्सर आते-जाते रहते। वे शहर से गांव के लिए व्यापार करते, लेकिन उनका असली मकसद कुछ और था। रामेश की उम्र पैंतालीस के करीब, मजबूत कद-काठी, चौड़ी छाती और मजबूत हाथ जो कभी खेतों में काम करते, कभी घर में कुछ और। वे और सुनीता के बीच का रिश्ता सालों से गुप्त था। शुरूआत हुई थी एक बारिश की रात, जब पति बाहर थे और रामेश रुकने आए थे। तब से हर बार जब मौका मिलता, वे चुपके से मिलते। परिवार को शक नहीं था, लेकिन सुनीता के दिल में अपराधबोध और उत्तेजना का मिश्रण था।
आज रात भी वैसी ही थी। पति थककर सो चुके थे, रवि शहर में था, और घर में सन्नाटा पसर गया। घड़ी के कांटे दो बजे की ओर इशारा कर रहे थे। सुनीता की नींद नहीं आ रही थी। वे बिस्तर पर करवटें बदल रही थीं, लेकिन मन में रामेश की यादें घूम रही थीं। कल शाम वे आए थे, और चुपके से आंखों से इशारा किया था – रात को रसोई में। सुनीता का दिल धड़क रहा था। वे धीरे से बिस्तर से उठीं, साड़ी ठीक की और चुपचाप बाहर निकल गईं। पति की सांसें गहरी थीं, कोई हलचल नहीं।
रसोई के दरवाजे पर पहुंचते ही सुनीता ने देखा – रामेश पहले से ही वहां खड़े थे। चांदनी रात की रोशनी खिड़की से आ रही थी, जो उनकी आकृति को और रहस्यमयी बना रही थी। रामेश ने मुस्कुराते हुए कहा, “सुनीता, आखिरकार आ गई। मैं तो तड़प रहा था।” उनकी आवाज गहरी और भरी हुई थी, जो सुनीता के शरीर में सिहरन पैदा कर रही थी।
सुनीता ने शरमाते हुए नजरें झुका लीं, लेकिन उनके होंठों पर मुस्कान थी। “रामेश जी, कितना रिस्क है। अगर कोई जाग गया तो?” वे बोलीं, लेकिन उनका शरीर कह रहा था कुछ और। रामेश ने आगे बढ़कर उनका हाथ पकड़ लिया। उनका स्पर्श गर्म था, जो सुनीता की त्वचा पर बिजली की तरह दौड़ गया। “डरो मत, सब सो रहे हैं। आज रात सिर्फ हमारी है।” रामेश ने कहा और उन्हें अपनी बाहों में खींच लिया।
रसोई का फर्श ठंडा था, लेकिन रामेश की बाहें गर्म। वे सुनीता को दीवार से सटा दिया। उनके होंठ सुनीता के होंठों पर चिपक गए। चुंबन गहरा था, जीभें आपस में लड़ रही थीं। सुनीता की सांसें तेज हो गईं। रामेश का एक हाथ उनकी पीठ पर फेर रहा था, दूसरा साड़ी के आंचल को सरका रहा। “तुम्हारी साड़ी कितनी सेक्सी लगती है,” रामेश ने फुसफुसाते हुए कहा, और आंचल को कंधे से उतार दिया। सुनीता की ब्लाउज अब खुला सा लग रहा था, छाती ऊपर-नीचे हो रही।
रामेश ने सुनीता की गर्दन पर किस किया, फिर कान के पास आकर कहा, “मैं तुम्हें चखना चाहता हूं।” सुनीता ने आंखें बंद कर लीं। रामेश का मुंह उनकी छाती पर पहुंच गया। उन्होंने ब्लाउज के हुक खोल दिए और ब्रा को ऊपर सरका दिया। सुनीता के स्तन बाहर आ गए – गोल, भरे हुए, निप्पल्स सख्त। रामेश ने एक निप्पल को मुंह में लिया और चूसने लगे। सुनीता की सिसकी निकल गई, “आह… रामेश… धीरे।” लेकिन उनका हाथ रामेश के सिर पर दबाव डाल रहा था।
रामेश दूसरा हाथ नीचे ले गए। सुनीता की साड़ी को पकड़कर ऊपर सरकाने लगे। पेटिकोट के ऊपर से उनकी उंगलियां चलीं। सुनीता की चूत गीली हो चुकी थी, पैंटी से सनसनाहट महसूस हो रही। रामेश ने पैंटी के किनारे से हाथ डाल दिया और उंगलियां चूत पर रगड़ने लगे। “कितनी गीली हो गई हो, सुनीता। तुम्हें भी उतनी ही चाहत है जितनी मुझे।” रामेश ने कहा। सुनीता ने सिर हिला दिया, लेकिन उनका शरीर कांप रहा था।
अब रामेश ने सुनीता को घुमाया, उनकी पीठ अपनी छाती से सटी। साड़ी को कमर से ऊपर चढ़ा दिया। पैंटी को नीचे खींच लिया। सुनीता की गांड नंगी हो गई, गोल और मुलायम। रामेश ने अपनी पैंट खोल दी। उनका लंड बाहर आ गया – मोटा, लंबा, सख्त। वे सुनीता की गांड पर रगड़ने लगे। “तैयार हो?” रामेश ने पूछा। सुनीता ने सिर हिलाया, “हां… डाल दो।”
रामेश ने लंड का सिरा सुनीता की चूत पर सेट किया। धीरे से धक्का दिया। चूत गीली थी, लेकिन टाइट। लंड अंदर सरक गया। सुनीता की सिसकी निकली, “आह… कितना मोटा है।” रामेश ने कमर पकड़ ली और ठोकने लगे। हर धक्के के साथ लंड चूत के अंदर-बाहर हो रहा। रसोई में हल्की थप्पड़ की आवाज गूंज रही। सुनीता का मुंह दबाए हुए सिसकारियां ले रही थीं। रामेश का एक हाथ आगे जाकर क्लिटोरिस पर रगड़ रहा था। “चोदो मुझे… जोर से,” सुनीता फुसफुसाईं।
रामेश ने स्पीड बढ़ा दी। लंड तेजी से चूत में घुस रहा, बाहर आ रहा। सुनीता के स्तन लहरा रहे थे। वे दीवार से टिके हुए थे, लेकिन शरीर कांप रहा। रामेश ने उनके बाल पकड़े और सिर पीछे खींचा। “तुम्हारी चूत कितनी टाइट है, सुनीता। जैसे पहली बार हो।” वे बोले। सुनीता ने जवाब दिया, “तुम्हारा लंड ही तो है जो मुझे पागल कर देता है।” ठोकने की रफ्तार बढ़ गई। चूत से रस टपक रहा था, फर्श पर गिर रहा।
कुछ देर बाद रामेश ने सुनीता को घुमाया। अब वे आमने-सामने थे। सुनीता की साड़ी कमर पर लिपटी हुई, ब्लाउज खुला। रामेश ने उन्हें काउंटर पर बिठा दिया। पैर फैलाए और लंड फिर से चूत में डाल दिया। अब धक्के ऊपर से नीचे। सुनीता के पैर रामेश की कमर पर लिपट गए। “हां… ऐसे ही… गहरा,” सुनीता बोलीं। रामेश के पसीने की बूंदें सुनीता की छाती पर गिर रही थीं। उनका मुंह स्तनों पर, चूसते हुए ठोक रहे।
उत्तेजना चरम पर पहुंच रही थी। सुनीता की चूत सिकुड़ने लगी। “मैं… आ रही हूं,” वे चीखीं, लेकिन आवाज दबी। रामेश ने जोर का धक्का दिया। “मैं भी…” और गर्म वीर्य चूत के अंदर बह गया। दोनों हांफ रहे थे। लंड अभी भी अंदर था, धीरे-धीरे नरम हो रहा। सुनीता ने रामेश को गले लगा लिया। “यह रहस्य हमेशा रहेगा,” वे बोलीं।
लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी। रामेश ने कहा, “अभी रात बाकी है।” वे सुनीता को नीचे उतारा और घुटनों पर बिठा दिया। लंड अभी भी आधा सख्त था, वीर्य से चिपचिपा। “चूसो इसे,” रामेश ने कहा। सुनीता ने शरमाते हुए मुंह खोला और लंड अंदर ले लिया। जीभ से चाटने लगीं, वीर्य चख रही। रामेश का हाथ उनके सिर पर, धीरे से दबाव डाल रहा। लंड फिर सख्त होने लगा। सुनीता की आंखों में चमक थी।
अब रामेश ने उन्हें खड़ा किया और रसोई के टेबल पर झुका दिया। गांड ऊपर। साड़ी पूरी ऊपर। रामेश ने थूक लगाया और लंड गांड की ओर सेट किया। “नहीं… वहां नहीं,” सुनीता बोलीं, लेकिन उत्सुकता थी। रामेश ने धीरे से दबाया। गांड टाइट थी, लेकिन गीली चूत से रस बहकर मदद कर रहा। लंड अंदर सरका। सुनीता दर्द से सिसकी, लेकिन आनंद भी। रामेश ठोकने लगे – गांड में। हर धक्का गहरा। “कितनी टाइट गांड है,” रामेश बोले। सुनीता का हाथ चूत पर, खुद रगड़ रही।
फिर से उत्तेजना बढ़ी। रामेश ने स्पीड बढ़ाई। गांड की थप्पड़ की आवाज। सुनीता चिल्लाई, “हां… फाड़ दो।” चरम पर पहुंचे। रामेश ने गांड में ही झड़ दिया। दोनों गिर पड़े। रसोई में गंध फैली – पसीने, वीर्य, उत्तेजना की।
सुबह होने से पहले वे अलग हुए। सुनीता साड़ी ठीक की, चुपचाप कमरे में लौटीं। रामेश बाहर निकल गए। लेकिन रहस्य बरकरार था। अगली रात का इंतजार शुरू हो गया। परिवार की जिंदगी सामान्य चल रही, लेकिन रसोई के कोने में यादें ताजा थीं। सुनीता कभी-कभी मुस्कुरातीं, रामेश की याद में। यह पारिवारिक रहस्य था, जो कभी न खुलने वाला।
कुछ दिनों बाद, रामेश फिर आए। इस बार लंबे समय के लिए। पति खेत पर थे, रवि अभी लौटा नहीं। शाम ढलते ही रामेश ने सुनीता को इशारा किया। रसोई में ही, लेकिन इस बार दिन में। दरवाजा बंद किया। सुनीता की साड़ी उतार दी। नंगी कर दिया। रामेश भी नंगे। बिस्तर की तरह टेबल पर लिटाया। चूत चाटने लगे। जीभ अंदर-बाहर। सुनीता के पैर कांपे। “आह… रामेश…” फिर लंड डाला। घंटों चुदाई। अलग-अलग पोजिशन – डॉगी, मिशनरी, काउगर्ल। सुनीता ऊपर बैठी, लंड पर उछल रही। स्तन लहराते। रामेश नीचे से ठोकते।
रात में बेडरूम में घुस आए। पति सो रहे, लेकिन वे चुपके से। सुनीता के मुंह में लंड डाला। ब्लोजॉब। फिर चूत में। जोर-जोर से, लेकिन आवाज दबी। सुबह तक थक गए। यह रहस्य गहरा होता गया। सुनीता गर्भवती हुईं, लेकिन किसी को पता न चला। बच्चा रामेश का था, लेकिन परिवार ने अपना माना। रहस्य चला, पीढ़ी दर पीढ़ी।
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