Maa ki chudai train me

शरीफ़ माँ ट्रेन स्टेशन पर खड़ी होकर ट्रेन का इंतज़ार कर रही थी। शाम का समय था, और स्टेशन पर भीड़ कम हो रही थी। माँ का नाम राधा था, उम्र करीब ४० साल, लेकिन उनकी शक्ल इतनी जवान लगती थी कि कोई भी उन्हें ३० की समझ ले। साड़ी पहने हुए, जिसके ब्लाउज़ से उनकी भरी हुई चूचियाँ बाहर झाँक रही थीं। वे थकी हुई लग रही थीं, घर से लंबी यात्रा करके आई थीं।

अचानक, एक अनजान आदमी ने उनके कंधे पर हाथ रखा। वह मोटा-तगड़ा था, चेहरे पर दाढ़ी, और आँखों में चमक। ‘बहन जी, ट्रेन लेट है, चलिए थोड़ा इधर चलें,’ उसने कहा। माँ ने मुस्कुराकर मना किया, लेकिन वह जोर पकड़कर उन्हें खींचने लगा। स्टेशन के कोने में एक पुराना टॉयलेट था, जहाँ लोग कम जाते थे। माँ डर गईं, लेकिन भीड़ में चिल्लाने की हिम्मत न पड़ी। वह उन्हें जबरदस्ती अंदर घसीट ले गया।

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टॉयलेट का दरवाज़ा बंद होते ही, वह आदमी माँ को दीवार से सटा दिया। ‘चुप रहो, वरना मार दूँगा,’ उसने धमकाया। माँ की साड़ी खींची, ब्लाउज़ फाड़ दिया। उनकी सफेद चूचियाँ बाहर उछल आईं, गुलाबी निप्पल्स सख्त हो चुके थे डर से। आदमी ने अपनी पैंट उतारी, उसका मोटा लंड बाहर आ गया, जो पहले से ही खड़ा था। ‘तेरी चूत मारूँगा आज,’ कहकर उसने माँ की साड़ी ऊपर चढ़ा दी। माँ की पैंटी फाड़ दी, और उनकी गीली चूत पर उंगली फेरने लगा।

माँ रोने लगीं, ‘नहीं, छोड़ दो,’ लेकिन वह सुनने को तैयार न था। उसने अपना लंड माँ की चूत पर रगड़ा, फिर एक झटके में अंदर धकेल दिया। माँ चीखी, लेकिन उसने अपना हाथ उनके मुँह पर रख दिया। जोर-जोर से लंड अंदर-बाहर करने लगा, चूत को चीरते हुए। ‘कितनी टाइट चूत है तेरी, रंडी,’ वह हाँफते हुए बोला। माँ का शरीर काँप रहा था, दर्द और डर से। वह तेज़ी से पेलता रहा, चूचियों को मसलता, निप्पल्स चूसता। आखिरकार, कुछ मिनटों में उसका लंड फड़कने लगा, और गर्म वीर्य माँ की चूत में छोड़ दिया।

वह हँसता हुआ बाहर निकल गया, माँ वहीं फर्श पर पड़ी रही। साड़ी गंदी, चूत से खून और वीर्य बह रहा था। वे रोते हुए उठीं, खुद को संभाला, और स्टेशन पर लौटीं। ट्रेन आ गई, वे चढ़ गईं। जनरल बोगी में सीट मिल गई, लेकिन थकान और दर्द से वे सिर झुकाए बैठी रहीं।

ट्रेन चल पड़ी। दो आदमी, जो पास की सीट पर बैठे थे, उनकी हालत देख रहे थे। एक का नाम राजू था, दूसरा श्याम। दोनों जवान, मज़बूत कद-काठी। राजू ने सबसे पहले बात की, ‘बहन जी, आप ठीक तो हैं? चेहरा पीला क्यों है?’ माँ ने सिर हिलाया, लेकिन आँसू आ गए। श्याम ने पानी का ग्लास दिया, ‘पी लो, कुछ बताओ क्या हुआ।’

धीरे-धीरे माँ ने स्टेशन वाली बात बता दी, बिना डिटेल्स के। दोनों पुरुषों की आँखों में सहानुभूति थी, लेकिन साथ ही वासना भी। राजू ने उनका हाथ पकड़ा, ‘हम तुम्हारी मदद करेंगे, डरो मत।’ ट्रेन की हलचल में, बोगी खाली हो रही थी। श्याम ने दरवाज़ा बंद कर लिया, ‘यहाँ कोई नहीं आएगा।’

राजू ने माँ को गले लगा लिया, ‘तुम्हें आराम चाहिए।’ उसके हाथ उनकी पीठ पर फेरने लगा, फिर चूचियों पर। माँ चौंकी, लेकिन थकान से विरोध न कर पाईं। श्याम ने दूसरी तरफ से साड़ी सरकाई, चूत पर हाथ रखा। ‘देखो, अभी भी गीली है,’ वह बोला। माँ शरमाईं, लेकिन उनके शरीर में आग लग चुकी थी। राजू ने ब्लाउज़ खोला, चूचियाँ बाहर निकाली और चूसने लगा। निप्पल्स को दाँतों से काटा, माँ सिसकारी भरने लगी।

श्याम ने पैंट उतारी, अपना लंड निकाला – लंबा और मोटा। ‘चूस लो इसे,’ कहकर माँ के मुँह में ठूँस दिया। माँ ने पहले हिचकिचाया, लेकिन फिर चूसने लगीं, जीभ से चाटती हुई। राजू ने साड़ी ऊपर की, चूत में उंगली डाली। ‘कितनी गरम है तेरी चूत,’ वह बोला। फिर अपना लंड बाहर निकाला और सीधे चूत में घुसेड़ दिया। माँ का मुँह भरा होने से चीख न निकली, सिर्फ आहें।

राजू ने जोर-जोर से धक्के मारे, चूत को फाड़ते हुए। श्याम का लंड माँ के मुँह में अंदर-बाहर हो रहा था, गला तक पहुँचता। कुछ देर बाद, राजू ने जगह बदली। अब श्याम ने माँ को सीट पर लिटाया, टाँगें फैलाकर चूत में लंड डाला। ‘अह्ह, मज़ा आ गया,’ वह कराहा। तेज़ी से चोदने लगा, गांड पर थप्पड़ मारते हुए। माँ अब मज़े लेने लगी थीं, ‘हाँ, और जोर से।’

राजू ने पीछे से आकर माँ की गांड पर थूक लगाया, और लंड को गांड में धकेलने की कोशिश की। माँ दर्द से चीखी, लेकिन श्याम ने चूत पीटते हुए रोका। फिर राजू ने मुँह में डाल दिया। दोनों बारी-बारी चूत और मुँह में लंड घुसा रहे थे। आखिरकार, श्याम ने चूत में झड़ दिया, गर्म माल भर दिया। राजू ने माँ के मुँह में वीर्य उगल दिया, जो वे निगल गईं।

ट्रेन की यात्रा जारी थी, माँ अब उनकी गोद में लेटी थीं, थकी लेकिन संतुष्ट। दोनों पुरुष मुस्कुरा रहे थे, जानते हुए कि रात अभी बाकी है।

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