Pados ke dadaji ne maa ko choda
मेरी माँ का नाम कोमल है। वह 36 साल की हैं, लेकिन लगती हैं 28 की। गोरी चिट्टी त्वचा, लंबे काले बाल जो कमर तक लहराते हैं, भरे हुए स्तन जो साड़ी में उभर आते हैं, पतली कमर और गोल-गोल गांड जो चलते समय लचकती है। आँखें काली-काली, होंठ रसीले, हमेशा स्माइल लिए। पापा का जॉब अच्छा है, लेकिन वे बाहर रहते हैं। मैं, अजय, 18 साल का, स्कूल में पढ़ता हूँ। हमारा फ्लैट ऊपर के फ्लोर पर है, और पडोस में एक दादाजी रहते हैं, नाम हरि लाल, 65 साल के, लेकिन मजबूत कद-काठी, सफेद बाल, लेकिन आँखों में चमक। उन्हें माँ बहुत पसंद थी। हमेशा माँ से बातें करते, कभी-कभी तो घर आ जाते। माँ उन्हें सम्मान देतीं, लेकिन कभी ज्यादा क्लोज न लगीं।
एक दिन शाम को, मैं लिफ्ट में जा रहा था। लिफ्ट ऊपर रुकी, दरवाजा खुला तो माँ अंदर थीं, साड़ी पहने, थकी हुई लग रही। दादाजी भी अंदर आ गए। लिफ्ट चली, लेकिन अचानक दादाजी ने माँ को दीवार से सटा लिया। माँ चौंकीं, ‘दादाजी, क्या कर रहे हैं?’ लेकिन दादाजी ने उनका मुँह पकड़ लिया और जबरदस्ती होंठों पर चूम लिया। उनकी जीभ माँ के मुँह में डाल दी, हाथ कमर पर। माँ विरोध करने लगीं, हाथ-पैर मारने लगीं, ‘छोड़ो दादाजी, ये गलत है!’ लेकिन दादाजी मजबूत थे, उन्हें सीने से दबा रखा। माँ की साड़ी सरक गई, ब्लाउज पर हाथ फेरा। लिफ्ट नीचे पहुँची, दरवाजा खुला तो दोनों झटके से अलग हो गए। माँ ने साड़ी संभाली, बाहर निकलीं बिना कुछ कहे। दादाजी मुस्कुराए, मुझे देखा और चले गए। मैं स्तब्ध खड़ा रहा, लेकिन कुछ बोला नहीं।
अगले दिन दोपहर को, मैं नीचे पार्क में दोस्तों के साथ खेल रहा था। दादाजी नीचे आए, मुझे बुलाया। ‘अजय बेटा, आ इधर।’ मैं गया, वे बेंच पर बैठे थे। उन्होंने धीरे से कहा, ‘तूने कल लिफ्ट में देखा न? तेरी माँ को?’ मैं हाँ में सिर हिलाया। वे हँसे, ‘बेटा, तेरी माँ को मैं अब तक तीन बार चोद चुका हूँ। तू जानना चाहता है कैसे?’ मैं चौंक गया, लेकिन उत्सुकता हुई। ‘हाँ दादाजी, बताओ।’
दादाजी ने विस्तार से बताया। पहली बार, दो महीने पहले। पापा बाहर गए थे, माँ अकेली। दादाजी ऊपर आए, बहाना बनाया कि पानी का प्रॉब्लम है। माँ ने चाय दी। चाय में उन्होंने नशीला पदार्थ मिला दिया था। माँ बेहोश सी हो गईं। दादाजी ने उन्हें बेडरूम में ले जाकर साड़ी उतारी। ‘तेरी माँ की चूत कितनी गोरी और टाइट थी। बाल कम, गुलाबी होंठ। मैंने अपना लंड निकाला, मोटा-सा, बूढ़ा लेकिन सख्त। माँ के मुँह में ठूँसा, चूसा नहीं तो मैंने गला दबाया। माँ ने चूसना शुरू किया, जीभ घुमाई। फिर चूत पर रगड़ा, धक्का मारा। चूत फट सी गई, खून निकला। मैंने पूरी रात धक्के मारे, स्तन चूसे, गांड में भी उंगली डाली। सुबह माँ को होश आया तो रोईं, लेकिन मैंने धमकी दी कि सबको बता दूँगा। तब से चुप रहीं।’
दूसरी बार, एक हफ्ते बाद। दादाजी फिर आए, इस बार माँ ने दरवाजा खोला तो डर गईं। लेकिन दादाजी ने अंदर घुसकर लॉक्ब किया। ‘माँ को दीवार से सटाया, साड़ी ऊपर चढ़ाई, पेटीकोट फाड़ा। चूत में सीधा लंड ठोका। माँ चीखीं, लेकिन पड़ोसी सुन न लें इसलिए दबा दिया। मैंने पीछे से चोदा, गांड पर थप्पड़ मारे। स्तन बाहर निकाले, निप्पल्स काटे। माँ की चूत गीली हो गई, मजा आने लगा। आखिर में चूत में झाड़ दिया, वीर्य टपका। माँ थककर लेट गईं।’
तीसरी बार, पिछले हफ्ते। शाम को, माँ बाजार से लौटीं। दादाजी लिफ्ट में इंतजार कर रहे थे। जैसे ही दरवाजा बंद हुआ, उन्होंने माँ को पकड़ लिया। ‘मैंने उनकी पैंटी उतारी, लंड मुँह में ठूँसा। माँ घुटनों पर थीं, चूस रही। लिफ्ट रुकी तो ऊपर ले गए, मेरे फ्लैट पर। वहाँ बेड पर लिटाया, गांड ऊपर की। तेल लगाया, गांड में लंड डाला। माँ चिल्लाईं, ‘दादाजी, दर्द हो रहा!’ लेकिन मैंने जोर-जोर से धक्के मारे। चूत मली, फिर गांड में झाड़ा। माँ रोईं, लेकिन अब मान गईं।’
दादाजी ने कहा, ‘बेटा, तेरी माँ अब मेरी रंडी है। आज दोपहर को फिर चुदाई करने वाला हूँ। अगर तुझे देखना है तो तीन बजे मेरे फ्लैट पर आ जाना। दरवाजा खुला रहेगा। लेकिन चुप रहना।’ मैं स्तब्ध था, लेकिन लंड सख्त हो गया। दोपहर तीन बजे, मैं चुपके से दादाजी के फ्लैट गया। दरवाजा कोसों था, अंदर झाँका। बेडरूम में माँ थीं, साड़ी पहने, लेकिन दादाजी ने उन्हें पकड़ रखा था। ‘कोमल रानी, आज फिर मजा लेंगे,’ दादाजी बोले। माँ विरोध करने लगीं, ‘नहीं दादाजी, अजय घर पर है।’
लेकिन दादाजी ने साड़ी खींच ली, ब्लाउज फाड़ दिया। स्तन बाहर उछल आए, बड़े-बड़े, निप्पल्स सख्त। दादाजी ने एक को मुँह में लिया, जोर-जोर से चूसा। माँ सिसकीं भरने लगीं, ‘आह… दादाजी, छोड़ो।’ लेकिन दादाजी ने पेटीकोट उतारा, पैंटी फाड़ी। चूत नंगी हो गई, गीली चमक रही। दादाजी ने अपना लंड निकाला, बूढ़ा लेकिन मोटा, नसें फूली हुईं। ‘चूस इसे,’ उन्होंने माँ के सिर को पकड़ा। माँ घुटनों पर बैठ गईं, लंड मुँह में लिया। जीभ से चाटा, चूसी। दादाजी बाल पकड़कर धक्के मारे, गला तक। ‘अच्छी रंडी है तू, कोमल।’
फिर दादाजी ने माँ को बेड पर लिटाया, पैर फैलाए। लंड चूत पर रगड़ा, ‘गीली हो गई है, साली।’ धक्का मारा, पूरा अंदर। माँ चीखीं, ‘उफ्फ… दर्द!’ लेकिन दादाजी तेज-तेज धक्के मारने लगे। बेड हिल रहा, चूत से चपचप आवाज। माँ के स्तन उछल रहे, दादाजी हाथों से मसल रहे। ‘तेरी चूत कितनी टाइट है, रोज चोदूँ तो भी कम न पड़े।’ माँ की साँसें तेज, आँखें बंद। कुछ देर बाद दादाजी ने पोजीशन बदली, माँ को घोड़ी बनाया। पीछे से गांड पकड़ी, लंड चूत में ठोका। थप्पड़ मारे गांड पर, लाल हो गई। ‘चोदो मुझे दादाजी… मजा आ रहा,’ माँ अब बोलीं, शायद मजा आने लगा।
दादाजी ने स्पीड बढ़ाई, पसीना बह रहा। ‘अब गांड मारूँगा।’ माँ डरीं, लेकिन दादाजी ने उंगली डाली पहले, फिर लंड। गांड टाइट थी, माँ चीखी, ‘फट रही है… आह!’ धीरे-धीरे अंदर गया। दादाजी धक्के मारे, एक हाथ से चूत मली। माँ का शरीर काँपने लगा, चरम पर पहुँची। ‘हाँ… झड़ रही हूँ!’ दादाजी भी झड़े, गांड में गर्म वीर्य भर दिया। लंड निकाला तो सफेद तरल बाहर बहा। माँ लेटी रहीं, हाँफती हुईं। दादाजी ने चुंबन किया, ‘कल फिर आना।’
मैं वहाँ से चुपके चला गया, मन में उथल-पुथल। लेकिन रात को सोते हुए लंड सख्त हो गया, माँ की चुदाई याद आ गई। अब क्या करूँ, सोचता रहता हूँ।
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