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राहुल ने प्रिया को अपनी बाहों में समेट लिया। उसका शरीर अभी भी कांप रहा था, और चेहरे पर वीर्य के धब्बे साफ दिख रहे थे। जंगल की रात अब गहरा अंधेरा हो चुका था, सिर्फ चांद की हल्की रोशनी पेड़ों के बीच से छन रही थी। नदी का पानी चुपचाप बह रहा था, लेकिन राहुल के कानों में प्रिया की चीखें अभी भी गूंज रही थीं। ‘प्रिया, मुझे माफ कर दो। मैं कमजोर हूं,’ राहुल ने रोते हुए कहा। प्रिया ने आंखें बंद कर लीं, उसके होंठ कांप रहे थे। ‘राहुल, बस घर चलो। ये सब भूल जाना चाहती हूं,’ उसने धीमी आवाज में कहा।

राहुल ने प्रिया के कपड़े इकट्ठे किए, जो इधर-उधर बिखरे पड़े थे। साड़ी फटी हुई थी, ब्लाउज चिथड़े हो चुका था। उसने प्रिया को अपनी शर्ट पहना दी और बैग से एक शॉल निकालकर लपेट दिया। वे दोनों लंगड़ाते हुए जंगल के रास्ते पर चल पड़े। प्रिया का शरीर दर्द से भरा था—चूत और गांड में जलन हो रही थी, स्तन पर काटने के निशान लाल थे। हर कदम पर दर्द उठता था, लेकिन वह चुपचाप चल रही थी। राहुल का मन अपराधबोध से भरा था, लेकिन अंदर ही अंदर एक अजीब सी उत्तेजना भी महसूस हो रही थी, जो उसे शर्मिंदा कर रही थी।

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वे घंटों चले। जंगल का रास्ता मुश्किल था, और अंधेरे में पेड़ों की डालें उनके रास्ते में आ रही थीं। आखिरकार, सुबह होने लगी। सूरज की पहली किरणें जंगल को रोशन करने लगीं। वे एक छोटे से गांव के पास पहुंचे, जहां से शहर का रास्ता था। राहुल ने प्रिया को एक ऑटो रिक्शा में बिठाया और डॉक्टर के पास ले गया। डॉक्टर ने प्रिया की जांच की। ‘ये गंभीर है। घाव हैं, और संक्रमण का खतरा है। पुलिस को बताओ,’ डॉक्टर ने कहा। लेकिन प्रिया ने सिर हिला दिया। ‘नहीं, डॉक्टर साहब। बस दवा दे दीजिए। हम घर चले जाएंगे।’ राहुल भी चुप रहा। वह जानता था कि ये बात फैल गई तो उनकी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी।

घर पहुंचने पर प्रिया ने खुद को कमरे में बंद कर लिया। राहुल बाहर खड़ा रहा, दरवाजा खटखटाता रहा। ‘प्रिया, खोलो ना। बात करो।’ लेकिन प्रिया ने जवाब नहीं दिया। रातें बीतने लगीं। प्रिया चुपचाप रहने लगी, खाना कम खाती, और रातों को बुरे सपने आते। राहुल काम पर जाता, लेकिन उसका मन कहीं न लगता। वह सोचता रहता, उन आदमियों के चेहरे, प्रिया का नंगा शरीर, उनके धक्के। कभी-कभी रात में वह प्रिया के साथ सोने की कोशिश करता, लेकिन प्रिया पीछे हट जाती। ‘नहीं, राहुल। छूओ मत मुझे,’ वह कहती।

एक हफ्ता बीत गया। एक शाम राहुल घर लौटा तो प्रिया स्नानघर से निकली। उसके शरीर पर निशान अभी भी थे, लेकिन वह थोड़ी शांत लग रही थी। ‘राहुल, हमारा रिश्ता… क्या बचेगा?’ उसने पूछा। राहुल ने उसे गले लगाने की कोशिश की, लेकिन प्रिया ने धीरे से धकेला। ‘मुझे समय दो।’ लेकिन उस रात, जब राहुल सो रहा था, प्रिया जागी हुई थी। उसके मन में वो दृश्य घूम रहे थे—उन मोटे लंडों का अंदर-बाहर होना, दर्द और एक अजीब सी गर्मी। वह खुद को छूने लगी, चूत पर उंगली फेरने लगी। ‘नहीं… ये क्या कर रही हूं मैं?’ लेकिन उत्तेजना रुक न गई। वह चुपचाप उंगली अंदर डालने लगी, कल्पना करने लगी उन धक्कों को।

दिन बीतते गए। राहुल ने नोटिस किया कि प्रिया बदल रही थी। वह ज्यादा सजने लगी, छोटे-छोटे कपड़े पहनने लगी। एक दिन शाम को वह बोली, ‘राहुल, क्या हम फिर जंगल घूमने जाएंगे?’ राहुल चौंक गया। ‘क्या? प्रिया, तुम पागल हो गई हो?’ लेकिन प्रिया की आंखों में एक चमक थी। ‘नहीं, बस… वो जगह भूलना चाहती हूं। दोबारा जाकर।’ राहुल समझ नहीं पाया, लेकिन वह मान गया। वे फिर वही जंगल के रास्ते पर चल पड़े। कार से उतरकर पैदल चलने लगे। नदी किनारे पहुंचे। वही जगह, जहां सब हुआ था। प्रिया ने नदी में पैर डुबोए। ‘राहुल, यहां रुको। मैं थोड़ा अंदर जाऊंगी।’

राहुल ने हामी भरी। प्रिया जंगल की ओर चली गई। राहुल नदी किनारे बैठा रहा, लेकिन अंदर एक बेचैनी थी। तभी उसे याद आया—वो आवाजें। जंगल से वही चार-पांच आदमी निकले। लीडर वही था, दाढ़ी वाला। ‘अरे, ये तो वही जोड़ा है! औरत कहां है?’ उन्होंने राहुल को पहचान लिया। राहुल डर गया, भागने की कोशिश की, लेकिन वे उसे पकड़ लिया। ‘चुप, बस देख। फिर से मजा लेंगे।’ उन्होंने राहुल को फिर बांध दिया, नदी किनारे की झाड़ी में।

प्रिया जंगल में अकेली थी। वह जानबूझकर आई थी। उसके मन में एक अजीब सी तलब थी। तभी वे आदमी उसके चारों ओर आ गए। ‘अरे रंडी, फिर आई? मिस कर रही थी क्या?’ लीडर ने हंसते हुए कहा। प्रिया ने विरोध नहीं किया। उसकी सांसें तेज हो गईं। ‘हां… मुझे… मुझे चाहिए,’ उसने फुसफुसाया। वे चौंक गए, लेकिन खुश हो गए। लीडर ने प्रिया की साड़ी खींच ली। प्रिया ने खुद ब्लाउज खोल दिया। उसके स्तन बाहर आ गए, निशान अभी भी थे। एक आदमी ने तुरंत चूसना शुरू कर दिया, जोर से दबाते हुए। प्रिया की सिसकी निकली, ‘आह… हां…’

लीडर ने पैंट उतारी और लंड बाहर निकाला। प्रिया ने खुद घुटनों पर बैठ गई और मुंह में ले लिया। वह चूसने लगी, जीभ से चाटने लगी। ‘अच्छी रंडी बनी है तू,’ लीडर ने कहा। प्रिया ने तेजी से चूसा, लंड को गले तक लिया। दूसरा आदमी पीछे आया, प्रिया की चूत पर हाथ फेरा। वह गीली थी। ‘देख, कितनी तैयार है।’ उसने अंडरवियर फाड़ा और लंड चूत में डाल दिया। प्रिया चीखी, लेकिन आनंद से। ‘चोदो… जोर से चोदो!’ वह बोली।

वे प्रिया को घास पर लिटा दिया। एक चूत में धक्के मार रहा था, लंड पूरी तरह अंदर-बाहर। प्रिया की चूत रस छोड़ रही थी। दूसरा उसके मुंह में लंड ठूंस रहा था, गला दबा रहा था। तीसरा स्तनों को मसल रहा था, निप्पल चूस रहा था। प्रिया का शरीर कांप रहा था, वह चिल्ला रही थी, ‘हां… और… गांड में भी डालो!’ लीडर ने प्रिया को उल्टा किया। उसकी गांड फैलाई, थूक लगाया और लंड अंदर ठोंक दिया। प्रिया की चीख गूंजी, लेकिन वह पीछे धकेल रही थी। ‘जोर से… फाड़ दो मेरी गांड!’

अब वे सब मिलकर प्रिया को चोद रहे थे। एक चूत में, एक गांड में, एक मुंह में। प्रिया के हाथों में दो लंड पकड़े हुए, हिला रही थी। वे बारी-बारी से बदल रहे थे। एक ने चूत में झड़ दिया, गर्म वीर्य भर दिया। प्रिया चिल्लाई, ‘हां… भर दो!’ दूसरा गांड में। वीर्य बाहर बहने लगा। तीसरा मुंह में, प्रिया ने निगल लिया। चौथा आदमी आया, प्रिया को खड़ा किया और दीवार की तरह पेड़ से सटा दिया। उसने प्रिया की टांगें उठाईं और चूत में घुसा। जोर-जोर से पेला, प्रिया के स्तन उछल रहे थे।

राहुल झाड़ी से सब देख रहा था। इस बार प्रिया विरोध नहीं कर रही थी। वह खुद मांग रही थी। राहुल का लंड खड़ा हो गया। वह खुद को छूने लगा, हिलाने लगा। ‘प्रिया… तुम… ‘ लेकिन वह रुक न सका। प्रिया अब पूरी तरह उनके कब्जे में थी। वे उसे घुमाते रहे—कभी कुत्ते की तरह पीछे से, कभी ऊपर चढ़कर। प्रिया के शरीर पर पसीना, रस और वीर्य मिलकर चिपचिपा हो गया। उसके बाल बिखरे, चेहरा लाल। ‘चोदो सबको… ग्रुप में चोदो!’ वह चिल्ला रही थी।

वे प्रिया को नदी किनारे ले आए। पानी में उतार दिया। प्रिया नंगी थी, पानी उसके शरीर पर बह रहा था। लीडर ने उसे पानी में झुकाया और पीछे से चूत में डाला। पानी छलक रहा था, धक्कों से। दूसरा सामने से मुंह में। प्रिया पानी पी रही थी, लेकिन चूस रही थी। तीसरा उसके नीचे आया, गांड में डालने की कोशिश की। प्रिया तीनों में भरी हुई, पानी में तैरती हुई चुद रही थी। राहुल देखते हुए झड़ गया, अपना वीर्य जमीन पर गिरा।

घंटों चला ये। वे प्रिया को थका दिया। आखिरकार, जब दोपहर हो गई, वे चले गए। प्रिया नदी में लेटी रही, मुस्कुराती हुई। राहुल आजाद हो गया और उसके पास पहुंचा। ‘प्रिया… तुमने… क्यों?’ प्रिया ने उसे देखा, ‘राहुल, वो दर्द अब सुख बन गया। अब हम साथ में ये कर सकते हैं।’ राहुल स्तब्ध था, लेकिन उसके मन में भी वही तलब जाग चुकी थी। जंगल अब उनका राज था, नदी का बहाव उनकी चीखों को ले जाता। उनका जीवन बदल चुका था—भय से वासना की ओर।

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