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Maa ko 3 majdoor ne choda

मेरी माँ का नाम दया है। वह बेहद खूबसूरत है, उसकी त्वचा गोरी और चिकनी है, लंबे काले बाल, पतली कमर और भरे हुए स्तन जो किसी को भी ललचा दें। हमारा घर पुराना था, और एक दिन गर्मी के मौसम में घर के कुछ काम के लिए तीन मजदूर आए। उनके नाम रमेश, श्याम और बबलू थे। वे मजबूत कद-काठी के थे, गंदे कपड़े पहने हुए, लेकिन उनकी आँखों में एक भूखी चमक थी।

दया घर का काम निपटा रही थी। वह साड़ी पहने हुए थी, जो उसके शरीर को और आकर्षक बना रही थी। मजदूर काम कर रहे थे, लेकिन उनकी नजरें बार-बार दया पर टिक जातीं। अचानक, रमेश ने दया को पीछे से पकड़ लिया। ‘क्या कर रहे हो?’ दया ने चिल्लाया, लेकिन श्याम और बबलू ने तुरंत उसके मुँह पर हाथ रख दिया। वे उसे जबरदस्ती बेडरूम में घसीट ले गए। दरवाजा बंद कर दिया और दया को बिस्तर पर पटक दिया।

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‘बस करो, छोड़ दो!’ दया ने गिड़गिड़ाया, लेकिन मजदूरों ने उसकी साड़ी खींच ली। उसका ब्लाउज फाड़ दिया, और उसके नंगे स्तन बाहर आ गए। रमेश ने तुरंत उसके एक स्तन को मुँह में भर लिया और चूसने लगा। श्याम ने दया की साड़ी नीचे सरका दी और उसके पैंटी को चीर दिया। दया का चूत नंगा हो गया, गीला और डर से काँपता हुआ। बबलू ने अपना लंड निकाला, जो मोटा और काला था, और दया के मुँह के पास रगड़ने लगा। ‘चूस ले, रंडी!’ उसने धमकाया।

दया रो रही थी, लेकिन मजदूरों ने उसे कोई मौका नहीं दिया। रमेश ने अपना लंड दया के चूत में घुसेड़ दिया। वह जोर-जोर से धक्के मारने लगा, दया का शरीर हिलने लगा। ‘आह… दर्द हो रहा है!’ दया चीखी, लेकिन रमेश ने और तेजी से चोदा। श्याम ने उसके स्तनों को मसलते हुए अपना लंड उसके हाथ में थमा दिया। बबलू ने दया के मुँह में लंड डाल दिया और गले तक चोदने लगा। वे तीनों बारी-बारी से दया को चोदते रहे। रमेश ने पहले चूत में झड़ दिया, गर्म वीर्य दया के अंदर भर दिया। फिर श्याम ने पीछे से गांड मारी, जोरदार धक्कों से दया की चीखें निकलने लगीं। बबलू ने मुँह में झाड़ा, दया को निगलने पर मजबूर किया।

यह पहली बार था, लेकिन मजदूरों ने दया को चुप रहने की धमकी दी। ‘अगर किसी को बताया तो तेरी इज्जत गई!’ उन्होंने कहा। दया डर गई, कुछ कह न सकी। अगले दिन से यह सिलसिला शुरू हो गया। हर रोज, जब घर में कोई न हो, वे बेडरूम में दया को घसीट ले जाते। कभी तीनों एक साथ, कभी एक-एक करके।

पहले हफ्ते में, वे सुबह आते और दया को नंगा करके चोदते। रमेश पसंद करता था चूत चाटना, वह दया की टाँगें फैलाकर जीभ से चूत को चाटता, फिर लंड घुसाता। श्याम को गांड मारना पसंद था, वह तेल लगाकर दया की गांड में लंड डालता और घंटों चोदता। बबलू हमेशा मुँह चोदता, दया के बाल पकड़कर लंड गले तक ठोकता। कभी वे दया को घुटनों पर बिठाकर तीनों लंड चूसवाते, फिर बारी-बारी चूत और गांड भरते। दया का शरीर थक जाता, लेकिन वे रुकते नहीं।

दूसरे महीने तक यह रोजाना चलता रहा। कभी दोपहर में, जब मैं स्कूल जाता, वे आ जाते। एक दिन तीनों ने दया को बिस्तर पर लिटाया और एक साथ चोदा। रमेश चूत में, श्याम गांड में, बबलू मुँह में। वे सिंक्रोनाइज होकर धक्के मारते, दया का शरीर काँपता, आहें भरती। वे हँसते, ‘तेरी माँ कितनी रसीली है!’ कहते। दया अब विरोध कम करती, लेकिन अंदर से टूट चुकी थी। हर चुदाई के बाद वे उसे साफ करने को कहते, लेकिन अगले दिन फिर वही। दो महीने में सैकड़ों बार चुदाई हो गई, दया का चूत और गांड ढीले हो गए, स्तन कटे-फटे।

फिर एक दिन, दो महीने बाद, दया बाजार गई। वह सब्जी खरीद रही थी, तभी रमेश, श्याम और बबलू दिख गए। वे मुस्कुराए, ‘अरे दया रानी, मिलीं!’ दया घबरा गई, भागने की कोशिश की, लेकिन वे उसे घेर लिया। ‘चल, थोड़ी बात करनी है,’ रमेश ने कहा और उसे बाजार के कोने में ले गए। वहाँ उन्होंने फोन निकाला, जिसमें दया की नंगी तस्वीरें थीं – चुदाई के दौरान ली हुईं। ‘ये अगर फैला दीं तो क्या होगा?’ श्याम ने धमकाया। दया काँप गई, ‘कृपया मत करो।’

‘तो चल, हमारे साथ लॉज चल। वरना सबको बता देंगे कि तू हमारी रंडी है!’ बबलू ने कहा। दया के पास कोई चारा न था। वे उसे बाजार से बाहर ले गए, एक गली में घुसा लॉज था। कमरा बुक किया और अंदर ले गए। दरवाजा बंद होते ही वे दया पर टूट पड़े। साड़ी उतार दी, नंगा कर दिया। ‘देख, कितने दिन बाद फिर चुदेगी!’ रमेश हँसा।

वे दया को बिस्तर पर फेंका। पहले रमेश ने चूत में लंड डाला, जोर-जोर से चोदा। दया की चीखें गूँजने लगीं। श्याम ने स्तनों को चूसा, फिर अपना लंड दया के मुँह में ठूँसा। बबलू ने पीछे से गांड मारी। लॉज का कमरा गंदा था, लेकिन वे बेफिक्र। वे घंटों चुदाई करते रहे। कभी दया को दीवार से सटा कर खड़ा करके चोदा, कभी कुत्ते की तरह पीछे से। तीनों ने बारी-बारी से चूत, गांड और मुँह भरा। आखिर में, वे दया को बीच में लिटाकर एक साथ झड़े – एक चूत में, एक गांड में, एक मुँह में। दया थककर लेटी रही, वीर्य से सनी हुई।

‘अब तू हमारी है, जब चाहें बुलाएँगे,’ उन्होंने कहा। दया चुप रही, लेकिन जानती थी कि यह सिलसिला अब रुकेगा नहीं। बाजार की उस मुलाकात ने सब कुछ बदल दिया।

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