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Maa ki chudai Uncle ne ki

शाम का समय था, सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था और पार्क में हल्की-हल्की ठंडक फैल रही थी। शहर के इस व्यस्त इलाके में यह पार्क एक शांत जगह थी, जहां लोग टहलने, बच्चों को खेलने और थोड़ी देर की मस्ती के लिए आते थे। रमेश अपनी पत्नी सुनीता और बहन के पति, यानी अपने जीजा जी अनिल के साथ पार्क में घूमने आया था। रमेश का काम व्यस्त था, इसलिए परिवार के साथ समय बिताना दुर्लभ था। सुनीता एक 38 साल की आकर्षक औरत थी, जिसकी गोरी त्वचा, भरी हुई छातियां और कूल्हों की मोटाई किसी को भी ललचाने के लिए काफी थी। वह साड़ी पहने हुए थी, जो हल्के हरे रंग की थी और उसके शरीर को और भी उभार रही थी। अनिल, जो सुनीता का देवर था, 42 साल का हट्टा-कट्टा आदमी था, जिसकी आंखों में हमेशा एक शरारती चमक रहती थी। वह रमेश का साला था, लेकिन परिवार में सबको लगता था कि अनिल और सुनीता के बीच कुछ खास जुड़ाव है।

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परिवार के साथ पिकनिक का प्लान था। रमेश ने बास्केट में खाना पैक किया था – समोसे, पकौड़े और ठंडी कोल्ड ड्रिंक्स। वे पार्क के एक कोने में, जहां घने पेड़ों की छांव थी, बैठ गए। बच्चे – रमेश और सुनीता का 10 साल का बेटा और अनिल की बेटी – पास के घास के मैदान में खेलने लगे। रमेश ने कहा, ‘भाभी, तुम थोड़ा आराम करो। मैं बच्चों को देखता हूं।’ सुनीता मुस्कुराई और अनिल की तरफ देखा। अनिल ने भी उसकी आंखों में आंखें डालीं, जैसे कोई गुप्त संदेश हो।

जैसे-जैसे शाम गहराती गई, पार्क में लोग कम होते गए। रमेश बच्चों के साथ थोड़ा दूर चला गया, उन्हें झूले पर झूलने के लिए ले गया। सुनीता और अनिल अकेले रह गए। अनिल ने सुनीता की तरफ झुकते हुए कहा, ‘भाभी, तुम आज बहुत सुंदर लग रही हो। यह साड़ी तुम्हारे शरीर पर ऐसे लिपटी है जैसे दूसरी त्वचा।’ सुनीता शरमाई, लेकिन उसकी आंखों में चमक थी। ‘अनिल, क्या कह रहे हो? रमेश सुन लेगा तो…’ अनिल हंस पड़ा, ‘वो तो बच्चों के पीछे भाग रहा है। हमारी तो बस थोड़ी देर की बातें।’ लेकिन बातें जल्दी ही इश्कबाज़ी में बदल गईं। अनिल ने अपना हाथ सुनीता की जांघ पर रख दिया, साड़ी के ऊपर से सहला दिया। सुनीता ने हल्का सा विरोध किया, लेकिन उसका शरीर गर्म हो रहा था।

अनिल की उंगलियां धीरे-धीरे ऊपर सरकने लगीं। ‘भाभी, याद है पिछली बार घर पर? जब रमेश बाहर गया था?’ सुनीता की सांसें तेज हो गईं। हां, याद था। अनिल ने उसे पहली बार चोदा था, जब रमेश ऑफिस गया था। तब से उनके बीच यह राज़ था। पार्क की इस छांव में, जहां कोई नहीं देख रहा था, अनिल का हौसला बढ़ गया। उसने सुनीता का हाथ पकड़ा और उसे खींचकर पेड़ों के पीछे ले गया, जहां एक छोटा सा घास का टुकड़ा था, छिपा हुआ। ‘अनिल, यहां? पागल हो गए हो?’ सुनीता फुसफुसाई, लेकिन उसकी चूत पहले से ही गीली हो रही थी।

अनिल ने सुनीता को अपनी बाहों में भर लिया। उसके होंठ सुनीता के होंठों पर चिपक गए। वे जोर-जोर से चूमने लगे, जीभें आपस में लड़ रही थीं। अनिल का एक हाथ सुनीता की साड़ी के ब्लाउज पर गया, छातियों को मसलने लगा। सुनीता की सिसकारियां निकलने लगीं। ‘उफ्फ… अनिल… धीरे…’ लेकिन अनिल रुका नहीं। उसने ब्लाउज के हुक खोल दिए और ब्रा को ऊपर सरका दिया। सुनीता की भरी हुई चूचियां बाहर आ गईं, गुलाबी निप्पल्स तने हुए। अनिल ने एक निप्पल मुंह में ले लिया, चूसने लगा। सुनीता के हाथ अनिल की कमर पर गए, उसकी शर्ट को खींचा।

अनिल ने सुनीता को घास पर लिटा दिया। साड़ी को ऊपर चढ़ा दिया, पेटीकोट के अंदर हाथ डाल दिया। उसकी उंगलियां सुनीता की चूत पर पहुंचीं, जो पहले से रस टपक रही थी। ‘भाभी, कितनी गीली हो गई हो। मेरा लंड तुम्हारी चूत के लिए तड़प रहा है।’ सुनीता ने अनिल की पैंट खोली, उसका मोटा लंड बाहर निकाल लिया। वह काला और लंबा था, नसें फूली हुईं। सुनीता ने उसे सहलाया, फिर मुंह में ले लिया। अनिल की सिसकारी निकली, ‘आह… भाभी… चूसो… जोर से…’ सुनीता ने लंड को गहराई तक मुंह में लिया, जीभ से चाटा। अनिल का प्रीकम उसके मुंह में आ गया।

कुछ मिनट बाद, अनिल ने सुनीता को उठाया। ‘अब चुदाई का समय है।’ उसने सुनीता की पेटीकोट और अंडरवियर उतार दिए। सुनीता नंगी कमर से नीचे हो गई, उसकी चूत साफ-सुथरी, गीली चमक रही थी। अनिल ने अपना लंड सुनीता की चूत पर रगड़ा। ‘डालो ना… अनिल… चोदो मुझे…’ सुनीता बिलखी। अनिल ने कमर पकड़ी और एक झटके में लंड पूरा अंदर धकेल दिया। सुनीता चीखी, ‘आह्ह्ह… मार डाला…’ लेकिन दर्द में मजा था। अनिल धीरे-धीरे पेलने लगा, लंड अंदर-बाहर हो रहा था। चूत के रस से चपचाप की आवाजें आने लगीं।

पार्क की हवा में उनकी सिसकारियां घुल रही थीं। अनिल ने स्पीड बढ़ाई, जोर-जोर से ठोकने लगा। सुनीता की चूचियां उछल रही थीं, वह अनिल की पीठ पर नाखून चला रही थी। ‘हां… अनिल… चोदो… अपनी भाभी की चूत फाड़ दो…’ अनिल ने पोजीशन बदली, सुनीता को डॉगी स्टाइल में कर दिया। उसके कूल्हे ऊपर उठे, अनिल पीछे से लंड घुसेड़ा। अब चुदाई और गहरी हो गई। अनिल के लंड के टक्कर मारने से सुनीता का पूरा शरीर कांप रहा था। ‘भाभी… तुम्हारी चूत कितनी टाइट है… रमेश को तो पता ही नहीं कि क्या खजाना है…’ अनिल हांफते हुए बोला।

वे दोनों पसीने से तर थे। पार्क में दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे, लेकिन यहां कोई नहीं था। अनिल ने सुनीता के बाल पकड़े, उसे पीछे खींचा और जोर से चोदा। सुनीता का क्लाइमैक्स नजदीक आ गया। ‘अनिल… मैं… आ रही हूं… उफ्फ…’ उसकी चूत सिकुड़ने लगी, रस बहने लगा। अनिल भी रुका नहीं, और तेज पेला। आखिरकार, वह गरम वीर्य सुनीता की चूत में झाड़ दिया। ‘ले लो… भाभी… मेरा रस…’ दोनों गिर पड़े, हांफते हुए।

कुछ देर बाद, वे कपड़े ठीक करने लगे। सुनीता की चूत से अनिल का वीर्य टपक रहा था, लेकिन वह मुस्कुरा रही थी। ‘अनिल, यह तो खतरनाक था। अगर कोई देख लेता तो…’ अनिल ने चूमा, ‘कोई नहीं देखेगा। हमारा राज़ सुरक्षित है।’ तभी रमेश बच्चों के साथ लौट आया। ‘कहां चले गए थे तुम दोनों?’ सुनीता ने हंसकर कहा, ‘बस, थोड़ा टहलने।’ रमेश को शक नहीं हुआ। वे खाना खाने लगे, लेकिन सुनीता और अनिल की नजरें बार-बार मिल रही थीं।

रात होने लगी। परिवार घर लौटा, लेकिन सुनीता के मन में पार्क की वह चुदाई घूम रही थी। अनिल ने वादा किया था कि अगली बार और मजा आएगा। परिवार के इस गुप्त रिश्ते में अब पार्क एक नई याद बन गया था। सुनीता सोच रही थी, कब फिर ऐसा मौका मिलेगा। अनिल का लंड फिर से तरस रहा था, और सुनीता की चूत भी। यह परिवार का राज़ था, जो कभी ना खुलने वाला था।

लेकिन अगले हफ्ते, मौका फिर आया। रमेश को अचानक ऑफिस का काम आ गया, और वह शाम को पार्क ही ले गया सबको। बच्चे खेल रहे थे, रमेश फोन पर व्यस्त। अनिल और सुनीता फिर वही छांव में चले गए। इस बार अनिल ने सुनीता को साड़ी ही ना उतारी, बस ऊपर चढ़ा दी। उसका लंड सीधा चूत में घुस गया। वे खड़े-खड़े चुदाई करने लगे। अनिल सुनीता को दीवार से सटा कर पेल रहा था। ‘भाभी… तुम्हारी गांड भी चोदूं?’ सुनीता हां में सिर हिलाई। अनिल ने लंड निकाला, थूक लगाया और सुनीता की गांड में धकेल दिया। दर्द से सुनीता कांपी, लेकिन मजा आया। अनिल ने गांड मारी, फिर चूत में। दोनो छेदों में घुसा। सुनीता चीख रही थी दबे स्वर में।

अनिल ने सुनीता को जमीन पर लिटाया, मिशनरी पोजीशन में चोदा। उसके पैर कंधों पर रखे, गहराई तक लंड मार रहा था। सुनीता के निप्पल्स चूसते हुए, चूत को रगड़ते हुए। क्लाइमैक्स में दोनों एक साथ आए। अनिल का वीर्य चूत भर गया। वे थककर लेटे रहे। इस बार चुदाई और लंबी थी, लगभग आधा घंटा। पार्क की रात में उनकी सिसकारियां हवा में विलीन हो गईं।

धीरे-धीरे यह सिलसिला चलता रहा। हर पार्क विजिट में अनिल सुनीता को चोदता। कभी मुंह में, कभी चूत में, कभी गांड में। सुनीता की भूख बढ़ती गई। रमेश को कभी शक न हुआ। बच्चे खुश, परिवार खुश। लेकिन असली मजा अनिल और सुनीता का था। पार्क अब उनका प्राइवेट चुदाई स्पॉट बन गया था। एक दिन, अनिल ने सुनीता से कहा, ‘भाभी, क्या हम घर पर भी?’ सुनीता मुस्कुराई, ‘हां, लेकिन पार्क का मजा अलग है। यहां खुली हवा में चुदाई का स्वाद निराला है।’

इस तरह, परिवार का यह गुप्त खेल चलता रहा। सुनीता की चूत हमेशा अनिल के लंड के लिए तैयार रहती। पार्क की हर शाम एक नई कहानी बन जाती।

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